पर्वत से बन कर खड़े हैं...
हर मिजाज़ से तन कर लड़ेंगे
***
जो पत्थर बरसा रहे
उन्हीं पर ये लौट कर गिरेंगे
कैसे ये खुद के पत्थरों से बचेंगे
हम इसी यकीं पर अड़े हैं,
***
ज़ख्म करने के ज़ुनून में
जो ज़ख्म खा रहे हैं
कौन जाने ये कैसे भरेंगे
हम तो जुल्मों मिजाज़ से लड़े हैं
***
अंधी अंधेरों की चादर में लिपटे
खुद की बनाई खाइयों में सिमटे
कैसे किसी का यकीं बनेंगे
हम तो बस इसी खौफ से डरे डरे हैं
No comments:
Post a Comment