Thursday, 14 March 2024

 पर्वत से बन कर खड़े हैं...

हर मिजाज़ से तन कर लड़ेंगे

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जो पत्थर बरसा रहे

उन्हीं पर ये लौट कर गिरेंगे

कैसे ये खुद के पत्थरों से बचेंगे

हम इसी यकीं पर अड़े हैं, 

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ज़ख्म करने के ज़ुनून में

जो ज़ख्म खा रहे हैं

कौन जाने ये कैसे भरेंगे

हम तो जुल्मों मिजाज़ से लड़े हैं

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अंधी अंधेरों की चादर में लिपटे

खुद की बनाई खाइयों में सिमटे

कैसे किसी का यकीं बनेंगे

हम तो बस इसी खौफ से डरे डरे हैं

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