गुलज़ार कोई शख्स तो,कोई ज़ार ज़ार है
खुद से लुटाके सब करार दिले-बेक़रार है
दिख रहे जो अक्स हैं, माज़ी की शक्ल में
खुद पूछता है शख्स क्या हाले - बयान है
सच है सभी बदल रहे चेहरे वक़्त-ए-संग
य कौन मेरा सामने, मुझसे ही अंजान है
गहराइयों में कैद हैं दिल की सच्चाईयाँ
गुमसुदा औ' खो गई सब शीरीं ज़ुबान है
अकेलापन, तन्हाईयाँ जकड़े हुए है धूप
डर रही परछाइयाँ, ये किसका दयार है