गहन उतर कर खुद से खुल कर
मुक्त भाव से ....खुद से जुड़कर
स्वर लहरी संग लहर लहर बन
आत्म स्वरों में पल पल रूक कर
मन से हट कर म ...न...बन कर
सुनो सुनो अंतर स्वर ..... गुंजन
ॐ ॐ ये ॐ ॐ है ॐ ॐ ही ईश्वर दर्शन
गहन उतर कर खुद से खुल कर
मुक्त भाव से ....खुद से जुड़कर
स्वर लहरी संग लहर लहर बन
आत्म स्वरों में पल पल रूक कर
मन से हट कर म ...न...बन कर
सुनो सुनो अंतर स्वर ..... गुंजन
ॐ ॐ ये ॐ ॐ है ॐ ॐ ही ईश्वर दर्शन
असर ..... ज़िंदगी में
होता है एक ही शब्द से
बदल जाती है ज़िंदगी
कहीं करीब से
मैं ढूंढ रहा हूँ कब से ......
वो एक शब्द ...बूंद सा ...
जो समंदर बन जाता है
वो एक शब्द ...
शबनम सा ....
भीगा भीगा ..............
अंतर तक भिगोता हुआ
वो एक शब्द ...
बारिश की फुहार सा
बरसता हुआ .....
भिगो देता है पूरी शाम
सोने नहीं देता है फिर रात को
शब्द भी कमाल है....
बदल लेता है अपना स्वरूप
बन जाता है ख्वाब ....
जगाता हुआ .....
दूर .....दूर से धुन प्रीत की
बांसुरी सी गूंज ......
पूरा आकाश बन जाता है जगमगाता चाँद
हवाओं में बस एक गीत
कब कोई ख्वाब झूला झुलाने लगता है
देह- मन- आत्मा ......
सब एक ही शब्द
गंध- गीत- प्रीत का आलोक
कोई दिव्य लोक
कोई अनन्य राग
एक शब्द गहराता हुआ अंतर में
बिखर जाता है
शब्द ......मुझे मिलता नहीं
मुझमें मिल जाता है...कोई
मैं शब्द हूँ ....
शब्द की तलाश में
उस चरम बिन्दु की तलाश में
जब मैं शब्द बन जाऊँ .... मगर बिखरूँ नहीं
........मुझे ढूँढना है
बस एक शब्द ..
मुझमें ही मुझसे ही ...........
कभी देखना मुझे मेरे शब्द-भावों बिना
कभी देखना मुझे पूरा खाली खाली
क्या है सचमुच कोई मुझमे ...मुझसे ....मेरे जैसा
जो दिखता हूँ मैं.....
मेरा खालीपन ही मेरा सच .....
कुछ रंग बिखरे बिखरे मिल जाएँगे
बस यही है मेरा सच
मुसकुराते हैं मेरे साथ ये सब रंग
शब्द तो अक्सर सायास ही बुलाता हूँ
रंग अनायास हाथ में देते हैं कूँची
बहुत कुछ बोलते हैं मौन
मौन ही होता है सबसे बड़ा सच
अंदर ही अंदर खोलता हुआ
उधेड़ता हुआ ....
झूठे धागे पक्की गिरह नहीं बांधते
गिरह भी झूठी ही होती
खुल जाती है कभी भी ...
किसी के सामने ....
सच का धागा सच्चा - पक्का
छोटा हो चाहे .....बांधे रखता है
मौन को बुनना पड़ता है
मौन को सुनना पड़ता है
मौन ही सृजन बीज
मौन ही ईश्वर रूप
सुनो दस्तक हर लम्हा ....
मौन का ही सच सुनाई देगा ....
मौन ही सच्ची राह देगा ....
मन मौन ...
बस....म.....न......
लो ठहर गया लम्हा लम्हा
क्या कह रहा लम्हा लम्हा
चाँद है मशगूल बातों में
चांदनी संग भीगी रातों में
मचल रहा लम्हा लम्हा
लो ठहर गया लम्हा लम्हा.....
आगोश में नशा नशा
मदहोश है समाँ समाँ
पिघल रहा लम्हा लम्हा
सहम गया लम्हा लम्हा.....
सच किरच किरच गया
बन हकीकत बिखर गया
सिहर गया लम्हा लम्हा
सहम गया लम्हा लम्हा....
टूटे बिखरे रिश्ते कुछ
निखरे से हैं दिखते कुछ
सुलझ रहा लम्हा लम्हा
सहम गया लम्हा लम्हा ....
बोलूं क्या है गहरे मन
खोलूं क्या है पहरे मन
महक रहा लम्हा लम्हा
सहम गया लम्हा लम्हा.....
थमी थमी सी सांस है
बढ़ी बढ़ी सी प्यास है
तरस रहा लम्हा लम्हा
ठहर गया लम्हा लम्हा...
लफ़्ज़ों में है खामोशियां
आंखो में हैं तन्हाईयां
सिमट रहा लम्हा लम्हा
ठहर गया लम्हा लम्हा
ख्वाब सारे हैं बेक़रार
शब कहे करो इन्तज़ार
सहर हुई लम्हा लम्हा
ठहर गया लम्हा लम्हा
पर्वत से बन कर खड़े हैं...
हर मिजाज़ से तन कर लड़ेंगे
***
जो पत्थर बरसा रहे
उन्हीं पर ये लौट कर गिरेंगे
कैसे ये खुद के पत्थरों से बचेंगे
हम इसी यकीं पर अड़े हैं,
***
ज़ख्म करने के ज़ुनून में
जो ज़ख्म खा रहे हैं
कौन जाने ये कैसे भरेंगे
हम तो जुल्मों मिजाज़ से लड़े हैं
***
अंधी अंधेरों की चादर में लिपटे
खुद की बनाई खाइयों में सिमटे
कैसे किसी का यकीं बनेंगे
हम तो बस इसी खौफ से डरे डरे हैं
बेबुनियाद जंग है तो वजूद खोना है
नफरतों के खेल में खौफ ज़िंदा होना है
हार जीत के झूठे इल्म की नज़र तले
खुद के कांधों पे ही खुद को ढोना है
तय है ज़िन्दगी हंसते रोते बसर होनी है
तो फिर क्यों बात बात पर रोना है
हंसने मुस्कुराने से ही हासिल है रोशनी
उसी के नूर से खुशनुमा सहर होना है
जितना अना का रंग होगा ज़ीस्त में
उतना ही फना की राह में गुम होना है
#जीवन_चिरंतन_यही_है__तत्वबोध
बर्फ पिघल जाएगी
बर्फ को पिघलना ही होता है
अंतर में उष्ण प्रवाह लुप्त
ताप प्रस्फुटन कब और कैसे हो
कोई चैतन्य अलाव नहीं
अभिन्न भाव प्रवाह नहीं
मन अंतर में दरारें
दरारों में बर्फ ही बर्फ
दरारों में मौजूद मौन परछाइयां
अपेक्षाएं ही अपेक्षाएं
कोई खुला दरवाजा नहीं
कौन खोले चेतना में द्वार
कभी कभी बर्फ पिघलती नहीं
जमी जमी बर्फ रिश्तों के बीच
जमती जाती हैं परत दर परत
लम्हों से सदियों तक
कोई उष्ण भाव प्रवाह नहीं
ना बाहर... ना अंदर ...
बस जमता हुआ मौन निरंतर
परत दर परत
जीवन चेतना सुप्त
बर्फ के पिघलने की प्रतीक्षा में
कभी होगा प्रखर चेतना में सूरज या
फटेगा भावों का ज्वालामुखी
बहेगा गरम लावा अपेक्षाओं का
पिघल जाएगी परतें बर्फ की
बांध नहीं पाएगा मन बूंद बूंद को भी
सागर पसर जाएगा अनंत तक
बोध होगा रूपांतरण का
बर्फ सा जमना पिघलना ही जीवन चिरंतन ...
यही है तत्व बोध
#मेरा_भटकाव_ही_मेरा_नाम
मुझे मुड़ना था ही नही कहीं
चलता रहा रास्ते पर
मुझे बताना था ही नहीं सच
चुप चुप रहा फासलों संग
मुझे बस ढूंढना था इक अक्स
तलाशता रहा आईनों में
मुझे उतरना था ही नहीं गहरे
दूर खड़ा रहा साहिलों पर
मुझे बनना था ही नहीं किस्सा
बस गुनगुनाता रहा
जिंदगी नामचीन हो
ये चाह नहीं बस
भरी भरी हो आनंद से
किसी भी नाम
मेरा भटकाव ही मेरा नाम