बेबुनियाद जंग है तो वजूद खोना है
नफरतों के खेल में खौफ ज़िंदा होना है
हार जीत के झूठे इल्म की नज़र तले
खुद के कांधों पे ही खुद को ढोना है
तय है ज़िन्दगी हंसते रोते बसर होनी है
तो फिर क्यों बात बात पर रोना है
हंसने मुस्कुराने से ही हासिल है रोशनी
उसी के नूर से खुशनुमा सहर होना है
जितना अना का रंग होगा ज़ीस्त में
उतना ही फना की राह में गुम होना है
No comments:
Post a Comment