अंश अंश से पूरक वर्धन
सृजन ध्यान के अनुभव में...
"अंश अंश में पूरक वर्धन" का आध्यात्मिक दर्शन इस सत्य को इंगित करता है कि अंश अंश दर्शन ही पूर्णता की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। अंशों में निहित पूर्ण भाव को समझकर उन्हें पूर्णता के दिशा में ले जाना चाहिए।
सृजन ध्यान से तात्पर्य है किसी भी विषय को सृजनात्मकता और ध्यान से अध्ययन करना। यह ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने मन को एकाग्र करके किसी कार्य को करने में समर्थ होता है, और उसके द्वारा अनुभव कर रहा होता है। इस ध्यान के अनुभव में समर्पण और आत्म-संवेदना की अवधारणा प्रबल भाव जागृत होता है।
विभिन्न अंशों का संगठन एक-दूसरे से जुड़ते हुए पूरक भाव जगाता है और ध्यान के साथ सृजनात्मक अनुभव होता है। यह चिंतन सृजन विचारशीलता और उत्कृष्टता के भाव में स्थित होने में मदद करता है।
जब जब हम अपने अनुभवों को संजोते और साझा करते हैं तो नवीन सोच के साथ सृजन प्रक्रिया का उन्नयन होता है। आत्म-समर्पण और आत्म-संवेदना की गहराई को अनुभव करने का अद्भुत अवसर मिलता है।
सृजन ध्यान अभ्यास में हमारा मन सकारात्मक, निखरा और संवेदनशील होता है। इस स्थिति में हम अहम भाव से ऊपर उठते हुए संपूर्ण ध्यान में लीन हो जाते हैं। हमारे विचार, अनुभव और क्रियाएँ श्रेष्ठ स्तर पर शांत और स्थिर होती हैं। इस स्थिति में हमारी अंतर्दृष्टि, संवेदनशीलता और स्वाध्याय सहज रूप में उच्चतम स्तर पर होते हैं। यह अवस्था स्वयं में एक निरंतर और सकारात्मक समर्पण की भावना और अनुभव के साथ आती है।
सृजन ध्यान वास्तव में एक ऐसी विधि है जो ध्यान के माध्यम से सृजनात्मक शक्तियों को जागृत करते हुए विचारों को स्पष्ट करने में मदद करता है। इसमें ध्यान और सृजनात्मक प्रक्रिया के बीच एक संगत और सहयोगी संबंध होता है, जिससे नए और नवीन विचार प्रकट हो सकते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, "अंश अंश से पूरक वर्धन" का अर्थ हो सकता है कि हमारी आत्मा या ब्रह्मांड का अंश है और हम उस पूर्णता के वर्धन की ओर अपने आत्मज्ञान या साधना के माध्यम से प्रवृत्त हो रहे हैं। यह विचार हमें हमारे अंतरात्मा के साथ संबंधित अहम मुद्दों को समझने और साधना के माध्यम से अपने स्वयं को विकसित करने की महत्वाकांक्षा को संज्ञान में लाता है ।
इति शुभम्

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