फिर कुछ राह नज़र आई
फिर कुछ चाह नज़र आई
लगता है बदला है मौसम
पिघलती आह नज़र आई
जज़्बाते-अल्फ़ाज़ यूं बोले
हर बात स्याह नज़र आई
इश्क़े- इबादत से लबरेज
क्यूँ बात गुनाह नज़र आई
है यकीं मुझे छू लूँगा रूह
रूहानी हमराह नज़र आई
चलो भूल जायें यादें पुरानी
ज़िंदगी बेपनाह नज़र आई
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