अपनी उदासियों के, मैं अक्स देखता रहा
कुछ पुराने कुछ नये, मैं जख्म देखता रहा
कश्तियाँ कागज की हैं मैं कब तक संभालू
समंदर के पानियों में, मैं रक्स देखता रहा
मेरे साथ जो चला था मेरी परछाई सा बना
वो छोड़ चला मुझको, मैं नक़्श देखता रहा
खड़ी हैं सारी वफाएँ , क्यूँ हाशियों में अब
कहानियों के हिस्सों में, मैं इश्क़ देखता रहा
इलाही तू ही दिखा मुझे इल्तियामे- राह
इल्मे-बहस इसरार में, मैं इल्म देखता रहा
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