लकीरों में आग
शब्दों में आग
लिपटा हुआ धुँआ
बेबाक बोलने की कोशिश में
बिखरा बिखरा.... एक किस्सा
खुद से द्वंद्व कर.... हार-जीत कर
एक शब्द ढूँढ रहा
एक लकीर खींच रहा
टूटा टूटा...... एहसासों का हिस्सा
कोई नहीं जुड़ता...
कोई नहीं जोड़ता....
किसी भी हिस्से से .....
रिश्तों के हिसाब में बहुत कच्चा
बीच राह खड़ा... या कोनों में....
मौन... मौन... कोसों दूर.....
उससे जिसकी बाजू पकड़े खड़ा....
मौन वर्तुलों में कब तक... कब तक.... बर्फ सा जमा रहे....
पिघलता हुआ... उतरता हुआ.. .. खुद में ही...
इक नरम एहसास ....
ऊँगुलियाँ.... ढूँढती हुई...
मौन सत्य का नाम....
बार बार.... खींचती हुई गहरी लकीर बाँहों पर...
लिखती हुई.... कहती हुई....
पकड़ लो नरम एहसास में शामिल आग....
मैं अब भी जिंदा रिश्ता हूँ..
जिंदगी ....कभी खुद से नहीं मरती.....
कोई मारता है....
रिश्तों में रिस रिस कर.....
लकीरों से अलगाव ......
शब्दों में भटकाव ....
भावों में अभाव....
अक्सर नज़र आता
यही चेहरा जिंदगी
शब्दों में आग
लिपटा हुआ धुँआ
बेबाक बोलने की कोशिश में
बिखरा बिखरा.... एक किस्सा
खुद से द्वंद्व कर.... हार-जीत कर
एक शब्द ढूँढ रहा
एक लकीर खींच रहा
टूटा टूटा...... एहसासों का हिस्सा
कोई नहीं जुड़ता...
कोई नहीं जोड़ता....
किसी भी हिस्से से .....
रिश्तों के हिसाब में बहुत कच्चा
बीच राह खड़ा... या कोनों में....
मौन... मौन... कोसों दूर.....
उससे जिसकी बाजू पकड़े खड़ा....
मौन वर्तुलों में कब तक... कब तक.... बर्फ सा जमा रहे....
पिघलता हुआ... उतरता हुआ.. .. खुद में ही...
इक नरम एहसास ....
ऊँगुलियाँ.... ढूँढती हुई...
मौन सत्य का नाम....
बार बार.... खींचती हुई गहरी लकीर बाँहों पर...
लिखती हुई.... कहती हुई....
पकड़ लो नरम एहसास में शामिल आग....
मैं अब भी जिंदा रिश्ता हूँ..
जिंदगी ....कभी खुद से नहीं मरती.....
कोई मारता है....
रिश्तों में रिस रिस कर.....
लकीरों से अलगाव ......
शब्दों में भटकाव ....
भावों में अभाव....
अक्सर नज़र आता
यही चेहरा जिंदगी
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