ईश आनंद....
कितना है मुझमें रंग, शब्द और भाव
बस यही खोज है अनवरत
अक्सर मन अबोध ही रहता है
कभी कभी सहज बोध
कोई अनन्य है उपस्थित अंतर में
जिसका प्राकट्य रूप कभी शब्द, कभी रंग...
चिंतन द्वंद नहीं ,
अनंत सेतु है....
जो जोड़ता है मन, बुद्धि और देह को
कभी कभी होता है एकाकार रूप प्रकट अंतर में
यही क्षण है अंतर्भूत आनंद...
बहो... रहो...आत्म सँग
ईश आनंद यही है....

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